
हरिद्वार। नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली कहावत शिक्षा विभाग पर चरितार्थ हो गई है। लंबे समय से पदोन्नति का इंतजार कर रहे शिक्षकों पर (बड़ा खेला) बड़ी मार पड़ी है। अधिकारी और बाबूओं के गठजोड़ ने उच्च अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकते हुए भारी अनियमितताओं के बीच शिक्षकों की पदोन्नति कर दी।
जुगाड़बाज शिक्षक सही स्कूल पा गए जबकि अन्य लोगों को दूर दूर पोस्टिंग दे दी गई।
विदित हो कि जनपद हरिद्वार के प्राथमिक शिक्षक लंबे समय से पदोन्नति की मांग कर रहे थे। एक साल की कवायद के बाद जून के माह में शिक्षकों की वरिष्ठता सूची जारी की गई। सूत्र बताते हैं कि यह वरीयता सूची सही प्रकार से नहीं बनाई गई ओर इसमें व्यापक त्रुटियां थी। इसके उपरांत जिला शिक्षा अधिकारी ने एक पत्र निदेशालय को लिख काउंसिलिंग के माध्यम से प्रमोशन की अनुमति मांगी। जिला स्तर पर शिक्षकों की डीपीसी हुई तथा 136 प्राथमिक के प्रधानाध्यापक एवं 42 जूनियर सहायक पर पदोन्नति का अनुमोदन हुआ। शिक्षक संगठनों के पदोन्नति में काउंसिलिंग की मांग के बावजूद मनमर्जी से विद्यालय आबंटित किए गए। हास्यास्पद यह है कि जब विभाग ने डीपीसी की उस वक्त इनके पास 178 पद थे और लिस्ट फाइनल होते होते सिर्फ 155 को प्रमोट कर बाकी को होल्ड कर दिया गया। मिली जानकारी के अनुसार यह कुचक्र लंबे समय से तैनात एक बाबू और अधिकारी की सांठगांठ के कारण हुआ।
काउंसिलिंग के पक्षधर जिला शिक्षा अधिकारी अपने पत्र से ही पीछे हट गए। पदोन्नति की जो सूची जारी हुई उसमें भारी विसंगति है। दुर्गम की अत्यधिक सेवा एवं वरिष्ठता सूची में ऊपर नाम होने के बावजूद कनिष्ठ शिक्षकों को पास के स्कूल आबंटित कर दिए गए। स्थिति यह है कि सौ फीसदी अस्थि विकलांग अध्यापिका शालू बेरी को दादूबास पोस्टिंग दी गई। राजकीय प्राथमिक विद्यालय समसपुर कटेबड़ एवं गुज्जर बस्ती प्रथम में प्रधानाध्यापक होने के बावजूद वहां पदोन्नति कर दी गई। प्रमोशन में दुर्गम की सेवा को दरकिनार करते हुए जूनियर शिक्षक को कथित रूप से पैसे लेकर पास के स्कूल दे दिए गए। सूत्र बताते हैं कि एक एक सीट के लिए मोटी वसूली हुई। जिसमें लंबे समय से पटल पर तैनात एक बाबू की भूमिका संदिग्ध रही है। वहीं नियुक्ति अधिकारी की भूमिका ओर कथनी करनी पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। यह अधिकारी अपनी पूर्व की पोस्टिंग फर्जी बिलों के मामले में विवादित रह चुके हैं तथा कार्यवाही का सामना कर चुके हैं।
करोड़ों की संपत्ति का मालिक है बाबू।
शिक्षा विभाग का यह बाबू करोड़ों को संपत्ति का मालिक है। कई वर्षों से तैनात यह बाबू अपने समय के विवादित एवं निलंबन की कार्यवाही झेल चुके सेवानिवृत्त जिला शिक्षा अधिकारी बेसिक का खास रहा है। जानकार बताते हैं कि उस वक्त डीईओ के घर बैठकर लिस्ट फाइनल हुआ करती थी। मिनिस्टीरियल संघ की आड़ में यह बाबू जिले से ट्रांसफर में बच जाता है जिसकी शिकायत मुख्यमंत्री से की गई है।
आखिर क्यों नहीं हुई काउंसिलिंग?
जिले के अधिकारी खुद निदेशालय को काउंसिलिंग का पत्र लिखकर खुद ही पलट गए। पहले सुगम दुर्गम खेलते रहे जबकि खुद कई शिक्षकों को प्रथम नियुक्ति सुगम में दे दी गई। काउंसिलिंग के पक्षधर ये अधिकारी सैटिंग गैटिंग के बाद पलटी मार गए तथा वरिष्ठता सूची को आंख बंदकर दरकिनार कर दिया एवं प्रमोशन में जमकर घालमेल कर गए।
